मन की बोल

कहाँ पर बोलना था और कहीं बोल जाते है सारे,
जहाँ खामोश रहना हो वहाँ मुँह खोल जाते हैं सारे ।
कटता जब शीश सैनिकों का तो खामोश रह जाते हैं,
कटता है अगर सीन पिक्चर का तो बोल जाते हैं सारे ।
वो कुर्सी खा रही मुल्क को तो क्यों नहीं बोल रहे,
मगर रोटी की हो अगर चोरी तो बोल जाते हैं सारे ।
नयी नस्लों के ये बच्चे ज़माने भर की सुन जाते हैं,
मगर माँ बाप कुछ बोले तो बच्चे मुँह खोल जाते सारे ।
बनाते फ़िरते हैं रिश्ते ज़माने भर हम अक्सर,
मगर जब घर में जरुरत हो तो रिश्ते मुँह मोड़ जाते हैं सारे ।
कहाँ पर बोलना था और कहीं बोल जाते है सारे,
जहाँ खामोश रहना हो वहाँ मुँह खोल जाते हैं सारे ।।

--सन्त राज खांडोदिया

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